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भजन - कहा कहूँ मेरे पिउकी ब...




हरिभक्त कवियोंकी भक्तिपूर्ण रचनाओंसे जगत्‌को सुख-शांती एवं आनंदकी प्राप्ति होती है।

Content
भैरव

कहा कहूँ मेरे पिउकी बात ।

जो रे कहूँ सोई अंग सुहात ॥टेक॥

जब मैं रही थी कन्या क्वाँरी ।

तब मेरे कर्म हता सिर भारी ॥१॥

जब मेरी पिउसे मनसा दौड़ी ।

सतगुरु आन सगाई जोड़ी ॥२॥

जब मैं पिउका मंगल गाया ।

तब मेरा स्वामी ब्याहन आया ॥३॥

हथलेवा कर बैठी संगा ।

तउ मोहि लीनी बायें अंगा ॥४॥

जनदरिया कहै मिट गई दूती ।

आपौ अरप पीवसँग सूती ॥५॥

Translation - भाषांतर

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Created by TransLiteral/ Courtsey {Khapre.org} on 2007-12-23T02:27:56.1767840Z
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