वैभव लक्ष्मी व्रत

वैभव लक्ष्मी व्रत शीघ्र फलदायी है

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वैभव लक्ष्मी व्रत

यह व्रत शीघ्र फलदायी है । किन्तु फल न दे तो तीन माह के बाद फिर से यह व्रत शुरु करना चाहिये । और जब तक मनवांछित फल न मिले तब तक यह व्रत तीन-तीन महीने पर करते रहना चाहिये । तो कभी भी इस का फल अवश्य मिलता ही है ।

व्रत विधि शुरु करने से पहले की विधि

१. 'श्री यंत्र' के सामने देख कर 'श्रीयंत्र को प्रणाम ।' ऐसा बोलकर श्रीयंत्र को प्रणाम करें ।

२. बाद मे लक्ष्मी जी के नीचे मुताबिक आठ स्वरूप की छबियॉं को प्रणाम करें ।

१. धनलक्ष्मी एवं वैभवलक्ष्मी स्वरूप

२. श्री गजलक्ष्मी मां

३. श्री अधिलक्ष्मी मां

३. श्री विजयालक्ष्मी मां

५. श्री ऐश्वर्यलक्ष्मी मां

६. श्री वीरलक्ष्मी मां

७. श्री धान्य लक्ष्मी मां

८. श्री संतान लक्ष्मी मां

३) बाद में नीचे दिया हुआ 'लक्ष्मी स्तवन' का पाठ करें ।

गहने की पूजा करते वक्त बोलने का

लक्ष्मी स्तवन

श्‍लोक

या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी ।

या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी ॥

या रत्‍नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी ।

सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्‍च पद्‌मावती ॥

लक्ष्मी स्तवन का हिन्दी मे भावार्थ - जो लाल कमल में रहती है, जो अपूर्व कांतिवाली है, जो असह्य तेजवाली है, जो पूर्ण रूप से लाल है, जिसने रक्‍तरूप वस्त्र पहने है, जो भगवान विष्णु को अति प्रिय है, जो लक्ष्मी मन को आनंद देती है, जो समुद्रमंथन से प्रकत हुई है, जो विष्णु भगवान की पत्‍नी है, जो कमल से जन्मी है और जो अतिशय पूज्य है, वैसी हे लक्ष्मी देवी! आप मेरी रक्षा करें ।

वैभवलक्ष्मी व्रत करने का नियम

१. यह व्रत सौभाग्यशाली स्त्रियां करें तो उनका अति उत्तम फल मिलता है । पर घर में यदि सौभाग्यशाली स्त्रियां न हों तो कोई भी स्त्री एवं कुमारिका भी यह व्रत कर सकती है ।

२. स्त्री के बदले पुरुष भी यह व्रत करें तो उसे भी उत्तम फल अवश्य मिलता है ।

३. यह व्रत पूरी श्रद्धा और पवित्र भाव से करना चाहिये । खिन्न होकर या बिना भाव से यह व्रत नही करना चाहिये ।

४. यह व्रत शुक्रवार को किया जाता है । व्रत शुरु करते वक्त ११ व २१ शुक्रवार की मन्नत रखनी पड़ती है । मन्नत के शुक्रवार पुरे होने पर विधिपूर्वक शास्त्रीय रीति अनुसार उद्यापन विधि करनी चाहिये । यह विधि सरल है । किन्तु शास्त्रीय विधि अनुसार व्रत न करने पर व्रत का जरा भी फल नही मिलता है ।

५.एक बार व्रत पूरा करने के पश्‍चात फिर मन्नत कर सकते है और फिर से व्रत कर सकते हैं ।

६.माता लक्ष्मी देवी के अनेक स्वरूप है । उनमें उनका 'धनलक्ष्मी स्वरूप' ही 'वैभवलक्ष्मी' है और माता लक्ष्मी को श्रीयंत्र अति प्रिय है । व्रत करते वक्त मां लक्ष्मीजी के हर स्वरूप को और 'श्रीयंत्र' को प्रणाम करना चाहिये । तभी व्रत का फल मिलता है । अगर हम इतनी भी मेहनत नहीं कर सकते है तो लक्ष्मीदेवी भी हमारे लिये कुछ करने को तैयार नहीं होंगी । और हम पर मां की कृपा नहीं होगी ।

७. व्रत के दिन सुबह से ही 'जय मां लक्ष्मी', 'जय मां लक्ष्मी' का रटन मन ही मन करना चाहिये । और मां का पूरे भाव से स्मरण करना चाहिये ।

८. शुक्रवार के दिन यदि आप प्रवास या यात्रा पर गये हो तो वह शुक्रवार छोड़कर उनके बाद के शुक्रवार को व्रत करना चाहिये पर व्रत अपने ही घर में करना चाहिये । सब मिला कर जितने शुक्रवार की मन्नत ली हो, उतने शुक्रवार पूरे करने चाहिये ।

९. घर में सोना न हो तो चांदी की चीज पूजा में रखनी चाहिये । अगर वह भी न हो तो रोकड रुपया रखना चाहिये ।

१०. व्रत प्रा होने पर कम से कम सात स्त्रियों को या आपकी इच्छा अनुसार जैसे ११, २१, ५१, १०१ स्त्रियों को वैभवलक्ष्मी व्रत की पुस्तक कुमकुम का तिलक करके भेंट के रूप में देनी चाहिये । जितनी ज्यादा पुस्तक आप देंगे उतनी मां लक्ष्मी की ज्यादा कृपा होगी और मां लक्ष्मी जी का यह अद्‌भुत व्रत का ज्यादा प्रचार होगा ।

११. व्रत के शुक्रवार को स्त्री रजस्वला हो या सूतकी हो तो वह शुक्रवार छोड़ देना चाहिये और बाद के शुक्रवार से व्रत शुरु करना चाहिये । पर जितने शुक्रवार की मन्नत मानी हो, उतने शुक्रवार पूरे करने चाहिये ।

१२. व्रत की विधि शुरु करते वक्त 'लक्ष्मी स्तवन' का एक बार पाठ करना चाहिये ।

१३. व्रत के दिन हो सके तो उपवास करना चाहिये और शाम को व्रत की विधि करके मां का प्रसाद लेकर शुक्रवार करना चाहिये । अगर न हो सके तो फलाहार या एक बार भोजन करके शुक्रवार करना चाहिये । अगर व्रतधारी का शरीर बहुत कमजोर हो तो ही दो बार भोजन ले सकते है । सबसे महत्त्व की बात यही है कि व्रतधारी मांलक्ष्मीजी पर पूरी-पूरी श्रद्धा और भावना रखे । और मेरी मनोकामना मां पूरी करेगी ही,' ऐसा दृढ संकल्प करे ।

वैभवलक्ष्मी व्रत की कथा

एक बड़ा शहर था । इस शहर में लाखो लोग रहते थे । पहले के जमाने के लोक साथ-साथ रहते थे और एक दूसरे के काम आते थे । पर नये जमाने के लोगों का स्वरूप ही अलग सा है । सब अपने अपने काम में रत रहते है । किसी को किसी की परवाह नहीं। घर के सदस्यों को भी एक-दूसरेकी परवाह नहीं होती । भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गये है । शहर में बुराइयां बढ़ गई थी । शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे ।

कहावत है कि 'हजारों निराशा में एक अमर आशा छिपी हुई है । इसी तरह इतनी सारी बुराइयों के बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे ।

ऐसे अच्छे लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी । शीला धार्मिक प्रकृति और संतोषी थी । उनका पति भी विवेकी और सुशील था ।

शीला और उनका पति इमानदारी से जीते थे । वे किसी की बुराई करते न थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे । उनकी गृहस्थी आदर्श गृहस्थी थी और शहर के लोक उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे ।

शीला की गृहस्थी इसी तरह खुशी-खुशी चल रही थी । पर कहा जाता है कि 'कर्म की गति अकल है', विधाता के लिखे लेख कोई नहीं समझ सकता है । इन्सान का नसीब पल भर मे राजा को रंक बना देता है और रंक को राजा । शीला के पति के अगले जन्म के कर्म भोगने के बाकी रह गये होंगे कि वह बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा । वह जल्द से जल्द 'करोडपति' होने के ख्वाब देखने लगा । इसलिये वह गलत रास्ते पर चढ़ गया और 'करोड़पति' की बजाय 'रोड़पति' बन गया । याने रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी ।

शहर मे शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा वगैरह बदियां फैली हुई थी । उसमें शीला का पति भी फॅंस गया । दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई । जल्द से जल्द पैसे वाला बनने की लालच मे दोस्तों के साथ रेस जुआ भी खेलने लगा । इस तरह बचाई हुई धनराशि, पत्‍नी के गहने, सब कुछ रेस-जुए में गंवा दिया था ।

इसी तरह एक वक्त ऐसा भी था कि वह सुशील पत्‍नी शीला को साथ मजे में रहता था और प्रभु भजन में सुख-शांति से वक्त व्यतीत करता था । उसके बजाय घर मे दरिद्रता और भूखमरी फैल गई । सुख से खाने की बजाय दो वक्त भोजन के लाले पड गये । और शीला को पति की गालियां खाने का वक्त आया था ।

शीला सुशील और संस्कारी स्त्री थी । उसको पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ । किन्तु वह भगवान पर भरोसा करके बडा दिल रख कर दुःख सहने लगी । कहा जाता है कि 'सुख के पीछे दुःख और दुःख के पीछे सुख' आआ ही है । इसलिये दुःख के बाद सुख आयेगा ही, ऐसी श्रद्धा के साथ शीला प्रभु भक्ति मे लीन रहने लगी ।

इस तरह शीला असह्य दुःख सहते-सहते प्रभुभक्ति में वक्त बिताने लगी । अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी ।

शीला सोच में पड़ गई कि मुझ जैसे गरीब के घर इस वक्त कौन आया होगा?

फिर भी द्वार पर आये हुए अतिथि का आदर करना चाहिये, ऐसे आर्यधर्म के संस्कार वाली शीला ने खड़े होकर द्वार खोला ।

देखा तो एक मांजी खड़ी थी । वे बड़ी उम्र की लगती थी । किन्तु उनके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था । उनकी ऑंखों में से मानो अमृत बह रहा था । उनका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलकता था । उनको देखते ही शीला के मन मे अपार शांति छा गई । वैसे शीला इस मांजी को पहचानती न थी । फिर भी उनको देखकर शीला के रोम-रोम आनंद छा गया । शीला मांजी को आदर के साथ घर में ले आयी । घर में बिठाने के लिए कुछ भी नही था । अतः शीला ने सकुचा कर एक फटी हुई चद्दर पर उनको बिठाया ।

मांजी ने कहा - 'क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं?

शीला ने सकुचा कर कहा - 'मां! आपको देखते ही बहुत खुशी हो रही है । बहुत शांति हो रही है । ऐसा लगता है कि मैं बहुत दिनो से जिसे ढूंढ रही थी वे आप ही है । पर में आपको पहचान नही सकती ।'

मांजी ने हॅंसकर कहा - 'क्यों? भूल गई? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर मे भजन-कीर्तन होते है, तब मै भी वहा आती हू । वहॉं हर शुक्रवार को हम मिलते है ।

पति गलत रास्ते पर चढ़ गया, तब से शीला बहुत दुःखी हो गई थी और दुःख की मारी वह लक्ष्मीजी के मंदिर में भी नही जाती थी । बाहर के लोगों के साथ नजर मिलाते भी उसे शर्म लगती थी । उसने याददास्त पर जोर दिया पर यह मांजी याद नही आ रहे थे ।

तभी माजी ने कहा, 'तू लक्ष्मीजी के मंदिर में कितने मधुर भजन गाती थी! अभी-अभी तू दिखाई नहीं देती थी, इसलिये मुझे हुआ कि तु क्यों नही आती है? कहीं बीमार तो नहीं हो गई है न? ऐसा सोच कर मैं तुझे मिलने चली आई हूँ ।

मांजी के अतिप्रेम भरे शब्दों से शीला का ह्रदय पिघल गया । उसकी ऑंखों में आसू आ गये । मांजी के सामने वह बिलख-बिलख कर रोने लगी । यह देख कर मांजी शीला के नजदीक सरके और उसकी सिसकती पीठ पर प्यार भरा हाथ फेर कर सांत्वना देने लगे ।

मांजी ने कहा - 'बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छांव जैसे होते है । सुख के पीछे दुःख आता है, तो दुःख के पीछे सुख भी आता है । धैर्य रखो बेटी! और तुझे क्या परेशानी है? तेरे दुःख की बात मुझे सुना । तेरा मन भी हलका हो जायेगा और तेरे दुःख का कोई उपाय भी मिल जायेगा ।'

मांजी की बात सुनकर शीला के मन को शांति मिली । उसने मांजी को कहा, 'मां! मेरी गृहस्थी में भरपूर सुख और खुशियॉं थी । मेरे पति भी सुशील थे । भगवान की कृपा से पैसे की बात मे भी हमे संतोष था । हम शांति से गृहस्थी चलाते ईश्वर-भक्ति में अपना वक्त व्यतीत करते थे । यकायक हमारा भाग्य हमसे रूठ गया । मेरे पति को बुरी दोस्ती हो गई । बुरी दोस्ती की वजह से वे शराब, जुआ, रे, चरस-गांजा वगैरह खराब आदतों के शिकार हो गये और उन्होने सब कुछ गॅंवा दिया । और हम रास्ते के भिखारी जैसे बन गये ।'

यह सुनकर मांजी ने कहा - 'सुख के पीछे दुःख और दुःख के पीछे सुख आता ही रहता है । ऐसा भी कहा जाता है कि, 'कर्म की गति न्यारी होती है।' हर इन्सान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते है । इसलिये तू चिंता मत कर । अब तू कर्म भुगत चुकी है । अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आयेंगे । तू तो मां लक्ष्मीजी की भक्त हे । मां लक्ष्मीजी तो प्रेम और करुणा के अवतार है । वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती है । इसलिये तू धैर्य रख के मां लक्ष्मीजी का व्रत कर । इससे सब कुछ ठीक हो जायेगा ।

'मां लक्ष्मीजी का व्रत' करने की बात सुन कर शीला के चेहरे पर चमक आ गई । उसने पूछा, 'मां! लक्ष्मीजी का व्रत कैसे किया जाता है, वह मुझे समझाइये । मै यह व्रत अवश्य करूंगी ।'

मांजी ने कहा, 'बेटी! मां लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है । उसे 'वरदलक्ष्मी व्रत' या 'वैभवलक्ष्मी व्रत' कहा जाता है । यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है । वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है ।' ऐसा कह कर मांजी 'वैभवलक्ष्मी व्रत' की विधि कहने लगी ।

'बेटी! वैभवलक्ष्मी व्रत वैसे तो सीधा सादा व्रत है । किन्तु कई लोक यह व्रत गलत तरीके से करते है । अतः उसका फल नही मिलता । कई लोग कहते है कि सोने के गहने की हलदी-कुमकुम से पूजा करो । बस! व्रत हो गया । पर ऐसा नही है । कोई भी व्रत शास्त्रीय विधिपूर्वक करना चाहिये । तभी उसका फल मिलता है । सिर्फ सोने के गहने की पूजा करने से फल मिल जाता हो तो सभी आज लखपति बन गये होते । सच्ची बात यह है कि सोने के गहनो का विधि से पूजन करना चाहिये । व्रत की उद्यापन विधि भी शास्त्रीय विधि मुताबिक करनी चाहिये । तभी यह 'वैभवलक्ष्मी व्रत' फल देता है ।

यह व्रत शुक्रवार को करना चाहिये । सुबह में स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनो और सारा दिन मन मे 'जय मां लक्ष्मी', 'जय मां लक्ष्मी' का रटन करते रहो । किसी की चुगली नही करनी चाहिये । शाम को पूर्व दिशा में मुंह रख सके, इसी तरह आसन पर बैठ जाओ ।

सामने पाटा रख कर उसके ऊपर रुमाल रखो । रुमाल पर चावल का छोटा सा ढेर करो । उस ढेर पर पानी से भरा तांबे का कलश रखकर, कलश पर एक कटोरी रखो । उस कटोरी में एक सोने का गहना रखो । सोने का न हो तो चांदी का भी चलेगा । चादी का न हो तो नकद रुपया भी चलेगा । बाद में घी का दीपक जला कर धूपसली सुलगा कर रखो ।

मां लक्ष्मीजी के बहुत स्वरूप है । और मां लक्ष्मीजी को 'श्रीयंत्र' अति प्रिय है । अतः 'वैभवलक्ष्मी' मे पूजन विधि करते वक्त सौ प्रथम 'श्रीयंत्र' और लक्ष्मीजी के विविध स्वरूपो का सच्चे दिल से दर्शन करो । उसके बाद लक्ष्मी स्तवन का पाठ करो । बाद मे कटोरी में रखे हुए गहने या रुपये को हल्दी-कुमकुम और चावल चढ़ा कर पूजा करो और लाल रंग का फूल चढ़ाओ । शाम को कोई मीठी चीज बनाकर उसका प्रसाद रखो । न हो सके तो शक्कर या गुड़ भी चल सकता है । फिर आरती करके ग्यारह बार सच्चे ह्रदय से 'जय मॉं लक्ष्मी' बोले । बाद मे ग्यारह या इक्कीस शुक्रवार यह व्रत करने का दृढ संकल्प मॉं के सामने करो और आपकी जो मनोकामना हो वह पूरी करने को मॉं लक्ष्मीजी को बिनती करो । फिर मॉं का प्रसाद बॉंट दो । और थोड़ा प्रसाद अपने लिये रखो । अगर आप में शक्ति हो तो सारा दिन उपवास रखो और सिर्फ प्रसाद खा कर शुक्रवार करो । न शक्ति हो तो एक बार शाम को प्रसाद ग्रहण करते समय खाना खा लो । अगर थोडी शक्ति भी न हो तो दो बार भोजन कर सकते हो । बाद मे कटोरी में रखा गहना या रुपया ले लो । कलश का पानी तुलसी क्यारे में डाल दो । और चावल पक्षियों को डाल दो । इसी तरह शास्त्रीय विधि अनुसार व्रत करने से उसका फल अवश्य मिलता है । इस व्रत के प्रभाव से सब प्रकार की विपत्ति दूर हो कर आदमी मालामाल हो जाता है । संतान न हो उसे संतान प्राप्त होती है । सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रहता है । कुमारी लडकी को मनभावन पति मिलता है ।

शीला यह सुनकर आनंदित हो गई । फिर पुछा -'मॉं! आपने वैभवलक्ष्मी व्रत ' की जो शास्त्रीय विधि बताई है, वैसे मैं अवश्य करूंगी । किन्तु इसकी उद्यापन विधि किस तरह करनी चाहिये? यह भी कृपा करके सुनाइये ।'

मांजी ने कहा, 'ग्यारह या इक्कीस जो मन्नत मानी हो उतने शुक्रवार यह 'वैभवलक्ष्मी व्रत' पुरी श्रद्धा और भावना से करना चाहिये । व्रत के आखरी शुक्रवार को जो शास्त्रीय विधि अनुसार उद्यापन विधि करनी चाहिये वह मै तुझे बताती हूँ । आखरी शुक्रवार को खीर या नैवेध रखो । पूजन विधि हर शुक्रवार को करते है वैसेही करनी चाहिये । पूजन विधि के बाद श्रीफल फोडो और कमसे कम सात कुंवारी या सौभाग्यशाली स्त्रियों को कुमकुम का तिलक करके साहित्य संगम की 'वैभवलक्ष्मी व्रत' की एक-एक पुस्तक उपहार मे देनी चाहिये । और सब को खीर का प्रसाद देना चाहिये । फिर धनलक्ष्मी स्वरूप, वैभवलक्ष्मी स्वरूप, मॉं लक्ष्मीजी की छबि को प्रणाम करे । मॉं लक्ष्मीजी का यह स्वरूप वैभव देने वाला है । प्रणाम करके मन ही मन भावुकता से मॉं की प्रार्थना करते वक्त कहे कि, 'हे मॉं धनलक्ष्मी! हे मॉं वैभवलक्ष्मी! मैने सच्चे ह्रदय से आपका वैभवलक्ष्मी व्रत' पूर्ण किया है । तो हे मॉं! हमारी (जो मनकामना की हो वह बोलो) की मनोकामना पूर्ण करो । हमारा सबका कल्याण करो । जिसे संतान न हो उसे संतान देना । सौभाग्यशाली स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना । कंवारी लडकी को मनभावन पति देना । आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत जो करे उनकी सब विपत्ति दूर करना । सब को सुखी करना । हे मॉं! आपकी महिमा अपरंपार है।'

इस तरह मॉं की प्रार्थना करके मॉं लक्ष्मीजी का 'धनलक्ष्मी स्वरूप' को भाव से वंदन करो ।'

मांजी के पास से 'वैभवलक्ष्मी व्रत' की शास्त्रीय विधि सुनकर शीला भावविभोर हो उठी । उसे लगा मानो सुख का रास्ता मिल गया है । उसने ऑंखे बंद करके मन ही मन उसी क्षण संकल्प लिया कि, 'हे वैभवलक्ष्मी मॉं! मैं भी मांजी के कहे मुताबिक श्रद्धा से शास्त्रीय विधि अनुसार 'वैभवलक्ष्मी व्रत' इक्कीस शुक्रवार तक करूंगी और व्रत की शास्त्रीय विधि अनुसार उद्यापन विधि करूंगी ।'

शीला ने संकल्प करके आंखे खोली तो सामने कोई न था । वह विस्मित हो गई कि मांजी कहॉं गये? यह मांजी दुसरा कोई नही था... साक्षात लक्ष्मीजी ही थी । शीला लक्ष्मीजी की भक्त थी । इसलिये अपने भक्त को रास्ता दिखाने के लिए मॉं लक्ष्मी देवी मांजी का स्वरूप धारण करके शीला के पास आई थी ।

दूसरे दिन शुक्रवार था । सवेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला मन ही मन श्रद्धा से और पूरे भाव से 'जय मां लक्ष्मी, जय मां लक्ष्मी' का मन ही मन रटन करने लगी । सार दिन किसी की चुगली की नही । शाम हुई तब हाथ-पांव-मुंह धो कर शीला पूर्व दिशा मे मुंह करके बैठी । घर में पहले सोने के बहुत से गहने थे । पर पतिदेव ने गलत रास्ते पर चढ़ कर सब गहने गिरवी रख दिये थे । पर नाक की चुन्नी बच गई थी । नाक की चुन्नी निकालकर, उसे धो कर शीला ने कटोरी मे रख दी । सामने पाटे पर रुमाल रख कर मुट्ठी भर चवल का ढेर किया । उस पर तांबे का कलश पानी भर कर रखा । उसके ऊपर चुन्नी वाली कटोरी रखी । फिर मांजी ने कही थी, वह शास्त्रीय विधि अनुसार वंदन, स्तवन, पूजन वगैरह किया । और घर में थोडी शक्कर थी, वह प्रसाद में रखकर 'वैभवलक्ष्मी व्रत' किया ।

यह प्रसा पहले पति को खिलाया । प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड गया । उस दिन उसने शीला को मारा नही, सताया भी नही । शीला को बहुत आनंद हुआ । उनके मन मे वैभवलक्ष्मी व्रत' के लिये श्रद्धा बढ़ गई ।

शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक वैभवलक्ष्मी व्रत' किया । इक्कीसवे शुक्रवार को मांजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को 'वैभवलक्ष्मी व्रत' की सात पुस्तके उपहार मे दी । फिर माताजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगी - 'हे मां धनलक्ष्मी! मैने आप का वैभवलक्ष्मी व्रत करने की मनत मानी थी वह व्रत आज पूर्ण किया है । हे मॉं! मेरी हर विपत्ति दूर करो । हमारा सबका कल्याण करो । जिसे संतान न हो, उसे संतान देना । सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना । कंवारी लड़की को मनभावन पति देना । आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना । सब को सुखी करना । हे मां! आपकी महिमा अपार है । ऐसा बोल कर लक्ष्मीजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छबि को प्रणाम किया ।

इस तरह शास्त्रीय विधिपूर्वक शीला ने श्रद्धा से व्रत किया और तुरन्त ही उसे फल मिला । उसका पति गलत रास्ते पर चला गया था, वह अच्छा आदमी हो गया और कडी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा । मां लक्ष्मीजी के वैभवलक्ष्मी व्रत के प्रभाव से उसको ज्यादा मुनाफा होने लगा । उसने तुरन्त शीला के गिरवी रखे गहने छुडा लिये । घर मे धन की बाढ सी आ गई । घर मे पहले जैसी सुख-शांति छा गई ।

वैभवलक्ष्मी व्रत का प्रभाव देख कर मोहल्ले की दूसरी स्त्रिया भी शास्त्रीय विधिपूर्वक वैभवलक्ष्मी व्रत करने लगी ।

हे मां धनलक्ष्मी! आप जैसे शीला पर प्रसन्न हुई, उसी तरह आपका व्रत करने वाले सब पर प्रसन्न होना । सबको सुख-शांति देना । जय धनलक्ष्मी मां! जय वैभवलक्ष्मी मां!

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2007-12-14T08:05:56.1630000
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