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कण्व II.

See also:  कण्व III.

n.  कश्यगोत्रोत्पन्न एक ऋषि । इसके पिता मेधातिथि [म.अनु.२५५.३१ कुं.] । इसका आश्रम मालिनी नदी के तट पर था । इसने शकुंतला का पालन पोषण बडे प्रेम से किया था । एक बार यह बाहर गया था, तब दुष्यंत ने शकुंतला से गंधर्वविवाह किया । इसने वापस आकर उसे योग्य कह कर उस विवाह की पुष्टि की [म.आ.६४.६८];[ भा.९.२०] । इसने दुर्योधन को मातलि की कथा बतायी । यह बोधप्रद कथा सुन कर भी जब उसने एक न सुनी, तब इसने शाप दिया कि, तेरी जंघा फोडने से तेरी मृत्यु होगी [म. उ.९५.१०३. कुं] । काल की दृष्टि से यह कथा किसी अन्य कण्व की होगी । यह गौतम के आश्रम में गया था । वहॉं की समृद्धि देख कर वैसी ही समृद्धि प्राप्त होवे इसलिये इसने तपस्या की। गंगा तथा क्षुधा को प्रसन्न किया । उसने आयुष्य, द्रव्य, भुक्तिमुक्ति की मांग की । वह तथा उसके वंशज कभी क्षुघापीडित न हों, ऐसा वर मांगा । वह उसे मिला भी । जहॉं उसने तप किया था उस तीर्थ का नाम आगे चल कर कण्वतीर्थ पडा [ब्रह्म.८५] । भरत के यज्ञ में यह मुख्य उपाध्याय था [म.आ.६९.४८] । इसे भरत ने एक हजार पद्मभार शुद्ध जम्बूनद स्वर्ण [म. द्रो. परि. १.८. पंक्ति.७५०-७५१] तथा एक हजार पद्म घोडे [म.शां.२९.४०] दक्षिण में दिये । भरत के यज्ञ के समय यह अथवा इसका पुत्र रहने की संभावना है । इसका पुत्र बाह्रीक (काण्व) था [ब्रह्म. १४८]

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