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वडवा II.


n.  एक अग्नि, जो समुद्र के भीतर वास्तव्य करती है । और्व नामक अग्नि जन्म लेते ही समस्त पृथ्वी को जलाने लगी । तब उसके पितरो ने आ कर उसे समझाया, एवं उसे अपनी क्रोधाग्नि को समुद्र मे डाल देने के लिए कहा । पितरों के आदेश से, और्व ने अपने क्रोधान्गि को समुद्र में डाल दिया । वहॉं आज भी अश्व की मुख जैसी आकृति बना कर, यह समुद्र का जल पीती रहती है [म. आ. १७१.२१ -२२] । वायु के अनुसार, यह एवं और्व अग्नि दोनों एक ही है [वायु. १.४७]; और्व २. देखिये ।

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