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विष्णु

See also:  VIṢṆU
One of the Hindú triad, Vishn̤u. He is considered as the Preserver. The several Avatárs are emanations from his essence, except that of कृष्ण, in whom he is held to have been wholly incarnate. He is represented as a mild and benevolent deity.
 पु. १ त्रिमूर्तीपैकीं एक देवता ; विश्वाचा पालनकर्ता . २ ( संगीत ) एका तालाचें नांव . यांत मात्रा सतरा व विभाग पांच आहेत . [ सं . ]
०क्रान्तकरण  न. ( नृत्य ) उजवा पाय चालण्याच्या बेतांत पुढें करून कुंचित करणें व रेचित करणें .
०क्रांत   क्रान्ता - पुस्त्री . एक औषधी वनस्पती , हिचीं फलें काळसर तांबूस रंगाची असतात . श्यांमाक दूर्वाला विष्णुक्रांता । - एभा २७ . १७५ .
०दैवतनक्षत्र  न. धनिष्ठानक्षत्र . पुढें कोणे एके काळीं । विष्णुदैवतनक्षत्रमेळीं । - जै २६ . ५ .
०नाभ  पु. ब्रह्मदेव .
०पद  न. गयेस असलेली विष्णूच्या पावलाची प्रतिमा . २ आकाश . शरवृष्टि करिति भरिति क्षणमात्रें विष्णुचें पद भ्राते । - मोकर्ण १८ . ६ .
०पदी  स्त्री. गंगा .
०पुराण  न. अठरा पुराणापैकीं एक महापुराण .
०पुरी  स्त्री. ( संगीत ) बंगालमधील विष्णुपुर या गांवावरून पडलेलें एका गायनपध्दतीचें नांव .
०बलि  पु. १ सोळा संस्कारांपैकीं एक संस्कार . गर्भधारणेस प्रतिबंधक अशा प्रेताच्या प्रेतत्वनिवृत्तीसाठी हा करावयाचा असतो . २ संन्याशाच्या मृत्यूनंतर तेराव्या दिवशीं करावयाचा विधि .
०भक्त  पु. १ विष्णुचा उपासक . २ वैष्णवपंथांतील व्यक्ति .
०रथ  पु. गरुड ; विष्णूचें वाहन . शोभे विष्णु रथावरी निवसला सोनेसळा नेसला । - र गजेद्रमोक्ष ४९ .
०लोक  पु. वैकुंठ ; स्वर्गातील विष्णूचें स्थान .
०वर्धन  पु. एक ब्राह्मणांचें गोत्र , वर्गाचें नांव . ( प्र . ) विष्णुवृध्द .
०वात  स्त्री. १ चार बोटें रुंदीची पांचपदरी कापसाची सुताची वात . २ चौदापदरी वात .
०वाहन  पु. गरुड . जर्जर जाहला विष्णुवाहन बदकांचे दंग्यांनीं । - ऐपो ४०३ .
०शयन  न. चातुर्मास ( आषाढी एकादशीपासून कार्तिकी एकादशीपर्यंत देव निद्रिस्त असतात यावरून ).
०शृंखला  पु. वामनद्वादशीच्या पूर्व दिवशीं एकादशीविध्द द्वादशी असून श्रवणनक्षत्र असेल तर हा योग मानतात . विष्णूची तीन पदें - दोन भुंवयांमधील प्रदेश . - योर १ . २६ .
योग  पु. वामनद्वादशीच्या पूर्व दिवशीं एकादशीविध्द द्वादशी असून श्रवणनक्षत्र असेल तर हा योग मानतात . विष्णूची तीन पदें - दोन भुंवयांमधील प्रदेश . - योर १ . २६ .
n.  जगत्संचालक एक आद्य देवता, जिसकी पूजा जगसंहार का आद्य देवता माने गये रुद्र-शिव के साथ सारे भरतखंड में भक्तिभाव से की जाती है । वैदिक देवताविज्ञान में निर्दिष्ट देवताओं में से विष्णु एवं रुद्रशिव ये दो देवता ही ऐसे हैं कि, जिनके प्रति भारतीयों की श्रद्धा एवं भक्ति स्थलकालादि सारे बंधन लॉंध कर सदियों से अबाधित रही है । यही कारण है कि, ये देवता भारतीय जनता के केवल दैवत ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का एक अविभाज्य भाग बन गये है ।
मानवाकृति दैवतोपासना का आद्य प्रतीक n.  भारतीय दैवतशास्त्र के इतिहास में, विष्णु एवं रुद्र-शिव मानवाकृति दैवतोपासना के आद्य प्रतीक माने जाते है । इन देवताओं का मानवीकरण उत्तर वैदिककाल में हुआ, जब वेदों के द्वारा प्रणीत यज्ञयात्मक उपासना पद्धति अधिकाधिक तंत्रबद्ध, एवं नित्याचरण के लिए कठिन होती जा रही थी । इस अवस्था में निर्दिष्ट रुद्र-शिव का परिवर्धित मानवी स्वरूप शैव उपासना पद्धति के द्वारा साकार हुआ, उसी प्रकार वेदों में निर्दिष्ट विष्णु देवता का परिवर्धित मानवी रूप वैष्णव-उपासना सांप्रदायों के द्वारा आविष्कृत हुआ। विष्णु देवता के इस नये परिवर्धित स्वरूप में, वैदिक साहित्य में निर्दिष्ट विष्णु को, सात्त्वत लोगों के द्वारा पूजित वासुदेव से, एवं ब्राह्मणादि ग्रंथों में निर्दिष्ट जगत्संचालन के नारायण देवता से समिलित करने का यशस्वी प्रयत्न किया गया। आगे चल कर पौराणिक साहित्य में विष्णु के अनेकानेक अवतारों की कल्पना प्रसृत हुई, जिसके अनुसार कृष्ण, राम दशरथि आदि देवतातुल्य पुरुषों को विष्णु के ही अवतार मान कर, वैष्णव उपासना की कक्षा और भी संवर्धित की गयी। इस प्रकार ऋग्वेद में चतुर्थ श्रेणि का देवता माना गया विष्णु पौराणिक काल में एक सर्वश्रेष्ठ देवता बन गया।
वैदिक साहित्य में n.  इस साहित्य में निर्दिष्ट इन्द्र, वरुण, अग्नि आदि देवताओं की तुलना में विष्णु का स्थान काफ़ी कनिष्ठ प्रतीत होता है । ऋग्वेद के केवल पाँच हि सूक्त विष्णु को उद्देश्य कर रचे गये है । इन सूक्तों में इसे स्वतंत्र अस्तित्व अथवा पराक्रम प्रदान नहीं किये गये है, बल्कि सूर्यदेवता का ही एक प्रतिरूप इसे माना गया है, एवं इन्द्र के सहायक के नाते इसका वर्णन किया गया है ।
स्वरूपवर्णन n.  एक बृहदाकार शरीरवाले नवयुवक के रूप में ऋग्वेद में इसका स्वरूपवर्णन प्राप्त है । इसे ‘उरुगाय’ (विस्तृत पादप्रक्षेप करनेवाला) एवं ‘उरुक्रम’ (चौड़े पग रखनेवाला) कहा गया है, एवं अपने इन पगों से यह सारे विश्र्व को नापता है, ऐसा निर्देश भी वहाँ किया गया है ।
निवासस्थान n.  अपने तीन पगों के द्वारा विष्णु ने पृथ्वी अथवा पार्थिव स्थानों को नाप लिया था, ऐसे निर्देश ऋग्वेद में प्राप्त है । इनमें से दो पग अथवा स्थान मनुष्य को दिखाई देते है, किन्तु इसका तिसरा अथवा उच्चतम पग मनुष्योंके द्रक्कक्षा के बाहर है । यही नहीं, पक्षियों के उड़ान के भी बाहर है [ऋ. १.१५५.५] । विष्णु के इस उच्चतम स्थान (परमं पदम्) अग्नि, के उच्चतम स्थान के समान माना गया है । वहाँ अग्नि, विष्णु के रहस्यात्मक गायों (मेघ) की रक्षा करता है [ऋ. ५.३३] । इस स्थान पर विष्णु पर विष्णु का निवास रहता है, एवं पुण्यात्मा लोग आनंद से रहते है । वहाँ मधु का एक कूप है, जहॉं देवतागण सुखपूर्वक रहते है [ऋ. १.१५४.५, ८.२९] । इसी तेजस्वी निवास्थान में इन्द्र एवं विष्णु का निवास रहता है, एवं वहाँ पहुँचने की कामना प्रत्येक साधक करता है । ऋग्वेद में अन्यत्र इसे तीन निवासस्थानवाला (त्रिषधस्थ) कहा गया है [ऋ.१.१५६.५] । ऋग्वेद में अन्यत्र विष्णु को पर्वत पर रहनेवाला (गिरिक्षित्) एवं पर्वतानुकूल (गिरिष्ठा) कहा गया है [ऋ. १.१५४]
पराक्रम n.  विष्णु के पराक्रम की अनेकानेक कथाएँ ऋग्वेद में प्राप्त है । इसे साथ लेकर इंद्र ने वृत्र का वध किया था [ऋ. ६.२०] । इन दोनों ने मिल कर दासों को पराजित किया, शंबर के ९९ दुर्गों को ध्वस्त किया, एवं वर्चिन् के दल पर विजय प्राप्त किया [ऋ. ७.९८]
विष्णु के तीन पग n.  विष्णु का सब से बड़ा पराक्रम (विक्रम) इसके ‘त्रिपदों’ का है, जहाँ इसने तीन पगों में समस्त पृथ्वी, द्युलोक एवं अंतरिक्ष का व्यापन किया था [ऋ. १.२२. १७-१८] । अधिकांश युरोपीय विद्वान् एवं यास्क के पूर्वाचार्य और्णवाभ, विष्णु के इन त्रिपदों का अर्थ सूर्य का उदय, मध्याह्न, एवं सूर्यास्त मानते है । किन्तु बर्गेन, मॅक्डोनेल आदि युरोपीय विद्वान एवं शाकपूणि आदि भारतीय आचार्य, उपर्युक्त प्रकृत्यात्मक व्याख्या को इस कारण अयोग्य मानते है कि, उसमें विष्णु के अत्युच्च तृतीय पग (परमं पद) का स्पष्टीकरण प्राप्त नहीं होता। विष्णु के इस तृतीय पग को सूर्यास्त मानना अवास्तव प्रतीत होता है । इसी कारण इन अभ्यासकों के अनुसार, यद्यपि विष्णु एक सौर देवता है, फिर भी उसके तीन पगों का अर्थ, सूर्योदय, मध्याह्न, सूर्यास्त आदि न हो कर, पृथ्वी, अंतरिक्ष, एवं आकाश इन तीन लोगों का विष्णु के द्वारा किया गया व्यापन मानना ही अधिक योग्य होगा। ऐसे माने से विष्णु का ‘परम पद’ स्वर्लोक से समीकृत किया जा सकता है, जो समीकरण ‘परम पद’ के अन्य वर्णनों से मिलता जुलता है ।
नियमबद्ध गतिमानता n.  पराक्रमी होने के साथ साथ, विष्णु अत्यंत गतिमान्, द्रुतगामी एवं तेजस्वी भी है । यह अग्नि, सों, सूर्य, की भॉंति विश्र्व के विधि नियमों का पालन करनेवाला, एवं उन नियमों का प्रेरक भी है । इसी कारण, इसे ‘क्षिप्र’, ‘एष’, ‘एवया’, ‘स्वर्दृश’, ‘विभूतद्युम्न’,‘एवयावन्’ कहा गया है [ऋ. १.१५५.५, १५६.१]
एक सौरदेवता n.  ऋग्वेद में प्राप्त उपर्युक्त निर्देशों से प्रातीत होता है कि, अपने विस्तृत पगों के द्वारा समस्त विश्र्व को नियमित रूप से पार करनेवालो सूर्य के रूप में ही विष्णुदेवता की धारणा वैदिक साहित्य में विकसित हुई थी । प्रत्येक चार नाम (ऋ.तु) धारण करनेवाले अपने नब्वें अश्र्वों (दिनों) को विष्णु एक घुमते पहिये के भाँति गतिमान बनाता है, ऐसा एक रूपकात्मक वर्णन ऋग्वेद में प्राप्त है [ऋ. १.१५५.६] । यहाँ साल के ३६० दिनों को प्रवर्तित करनेवाले सूर्यदेवता का रूपक स्वष्टरूप से प्रतीत होता है । ब्राह्मण ग्रंथों में विष्णु का कटा हुआ मस्तक ही सूर्य बनने का निर्देश प्राप्त है [श. ब्रा. १४.१.१.१०] । इसके हाथ में प्रवर्तित होनेवाला चक्र है, जो सूर्य के सदृश ही प्रतीत होता है [ऋ. ५.६३] । विष्णु का वाहन गरुड़ है जिसे ‘गरुत्मत्’ एवं ‘सुपर्ण’ ये ‘सूर्यपक्षी’ अर्थ की उपाधियाँ प्रदान की गयी है [ऋ. १०.१४४.४] । विष्णु के द्वारा अपने वक्षःस्थल पर धारण किया गया कौस्तुभ मणि, इसके हाथ में स्थित पद्म, इसका पीतांबर एवं इसके ‘केशव’ एवं ‘हृषीकेश’ नामान्तर ये सारे इसके सौरस्वरूप की ओर संकेत करते है । कई अभ्सासकों के अनुसार, विष्णुदेवता की अविष्कृति सर्वप्रथम ‘सूर्यपक्षी’ के रूप में हुई थी, एवं ऋग्वेद में निर्दिष्ट ‘सुपर्ण’ (गरुड पक्षी) यही विष्णु का आद्य स्वरूप था [ऋ. १०.१४९.३] । विष्णु के ‘श्रीवत्स’,‘कौस्तुभ’, ‘चर्तुर्भुजत्त्व’ ‘नाभिकमल’ आदि सारे गुणविशेष एवं उपाधियाँ, इसके पक्षीस्वरूप के ही द्योतक प्रतीत होते है ।
भक्तवत्सलता n.  विष्णु के भक्तवत्सलता का निर्देश ऋग्वेद में अनेक बार प्राप्त है । अपने सारे पराक्रम इसने त्रस्त मनुष्यों को आवास् प्रदान करने के लिए एवं लोकरक्षा केलिए किये थे [ऋ. ६.४९.१३, ७.१००,१.१५५] । विष्णु की इसी भक्तवत्सलता का विकास आगे चल कर विष्णु के अनेकानेक अवतारों की कल्पना में अविष्कृत हुआ, जहाँ नानाविध स्वरूप धारण करने की श्रीविष्णु की अद्भुत शक्ति का भी सुयोग्य उपयोग किया गया [ऋ. ७.१००.१] । विष्णु के अवतारों का सुभ्वष्ट निर्देश यद्यपि ऋग्वेद में अप्राप्य है, फिर भी वामन एवं वराह अवतारों का धुँधलासा संकेत वहाँ पाया जाता है [ऋ. १.६१.७,८.७७.१०] । इन्हीं अवतार कल्पनाओं का विकास आगे चल कर ब्राह्मण ग्रंथों में किया हुआ प्रतीत होता है ।
अवंध्यता का देवता n.  डॉ. दांडेकरजी के अनुसार, ऋग्वेद में निर्दिष्ट विष्णु अवंध्यता (फर्टिलिटी) का एक देवता है, एवं ‘इंद्र-वृषाकपि-सूक्त’ में निर्दिष्ट ‘वृषाकपि’ स्वयं विष्णु ही है [ऋ. १०.८६] । ऋग्वेद में अन्यत्र विष्णु को ‘शिपिविष्ट’ (गूढरूप धारण करनेवाला) कहा गया है, एवं इसकी प्रार्थना की गयी है ‘अपने इस रूप को हमसे गुप्त न रक्खो’ [ऋ. ७. १००.६] । यह भ्रुणों का रक्षक है, एवं गर्भाधान के लिए अन्य देवताओं के साथ इसका भी आवाहन किया गया है [ऋ. ७.३६] । एक अत्यंत सुंदर बालक गर्भस्थ करने के लिए भी इसकी प्रार्थना की गयी है [ऋ. १०.१८४.१]
व्युत्पत्ति n.  विष्णु शब्द का मूल रूप ‘विष’ (सतत क्रियाशील रहना) माना जाता है । मँकडोनेल, श्रेडर आदि अभ्यासकों ने इसी मत का स्वीकार किया है, एवं उनके अनुसार सतत क्रियाशील रहनेवाले सौर स्वरूपी विष्णु को यह उपाधि सुयोग्य है । अन्य कई अभ्यासक विष्णु शब्द का मूल रूप ‘विश्’ (व्यापन करना) मानते है, एवं विश्र्व की उत्पत्ति करने के बाद विष्णु ने उसका व्यापन किया, यह अर्थ वे ‘विष्णु’ शब्द से ग्रहण करते है । पौराणिक साहित्य में भी इसी व्युत्पत्ति का स्वीकार किया गया है, जैसा कि विष्णुसहस्त्रनाम की टीका में कहा गया हैः-- चारचरेषु भूतेषु वेशनात् विष्णु रुच्यते। डॉ. दांडेकरजी के अनुसार, विष्णु का मूल रूप ‘वि+स्नु’ था, एवं उससे हवा में तैरनेवाले पक्षी की ओर संकेत पाया जाता है (डॉ. दांडेकर, पृ. १३५) ।
ब्राह्मण ग्रन्थों में n.  ऋग्वेद में कनिष्ठ श्रेणी का देवता माना गया विष्णु ब्राह्मण ग्रन्थों में सर्वश्रेष्ठ देवता माना गया प्रतीत होता है [श. ब्रा. १४.१.१.५] । यज्ञविधि में सर्वश्रेष्ठ देवता विष्णु है, एवं सर्वाधिक कनिष्ठ देवता अग्नि है, ऐसा स्पष्ट निर्देश ऐतरेय ब्राह्मण में प्राप्त हैः-- अग्निर्वै देवानामवमो, विष्णुः परमः। तदन्तरेण सर्वाः अन्या; देवताः।। अर्थवेद में यज्ञ को उष्णता प्रदान करने के लिए विष्णु का स्तवन किया गया है । ब्राह्मणों में विष्णु के तीन पगों का प्रारंभ पृथ्वी से होकर वे द्युलोक में समाप्त होते है, ऐसा माना गया है । विष्णु के परमपद को वहाँ मनुष्यों का चरम, अभीष्ट, सुरक्षित शरणस्थल माना गया है [श. ब्रा. १.९.३]
विष्णु का श्रेठत्व n.  ब्राह्मण ग्रन्थों में प्राप्त विष्णु देवता के वर्णन से प्रतीत होता है कि, उस समय विष्णु एक सर्वश्रेष्ठ देवता मानने जाने लगी थी । उसी श्रेष्ठता का साक्षात्कार कराने के लिए, अनेकानेक कथाएँ उन ग्रन्थों में रचायी गयी है, जिनमें से निम्न दो कथाएँ प्रमुख है । एक बार देवों ने ऎश्र्वर्यप्राप्ति के लिए एक यज्ञ किया, जिस समय यह तय हुआ कि, जो यज्ञ के अंत तक सर्वप्रथम पहुँचेगा वह देव सर्वश्रेष्ठ माना जायेगा। उस समय यज्ञस्वरूपी विष्णु अन्य सारे देवों से सर्वप्रथम यज्ञ के अंत तक पहुँच गया, जिस कारण यह सर्वश्रेष्ठ देव साबित हुआ। आगे चल कर इसका धनुष टूट जाने के कारण, इसका सिर भी टूट गया, जिसने सूर्सबिंब का आकार धारण किया [श. ब्रा. १४.१.१] । उसी सिर को अश्र्विनों के द्वारा पुनः जोड़ कर, यह द्युलोक का स्वामी बन गया [तै. आ. ५.१.१-७] । एक बार देवासुर-संग्राम में देवों की पराजय हुई, एवं विजयी असुरों ने पृथ्वी का विभाजन करना प्रारंभ किया। वामनाकृति विष्णु के नेतृत्त्व में देवगण असुरों के पास गया, एवं पृथ्वी का कुछ हिस्सा मॉंगने लगा। फिर विष्णु की तीन पगों इतनी ही भूमि देवों को देने के लिए असुर तैयार हुएँ। तत्काल विष्णु ने विराट रूप धारण किया, एवं अपने तीन पगों में तीनों लोक, वेद, एवं वाच् को नाप लिया [श. ब्रा. १.२.५];[ ऐ. ब्रा. ६.१५]
अवतारों का निर्देश n.  उपर्युक्त वामनावतार की कथा के अतिरिक्त, विष्णु के वाराह अवतार का भी निर्देश ब्राह्मण ग्रन्थों में प्राप्त है, जहाँ वाराहरूपधारी विष्णु पृथ्वी का उद्धार करने के लिए जल से बाहर आने की कथा दी गयी है [श. ब्रा. १४.१.२] । वहाँ इस वाराह का नाम ‘एमूष’ बताया गया है । विष्णु के दो अन्य अवतारों के स्त्रोत भी ब्राह्मण ग्रंथों में प्राप्त है, किन्तु उन्हें स्पष्ट रूप से विष्णु के अवतार नही कहा गया है । प्रलयजल से मनु को बचानेवाला मत्स्य, एवं आद्यजल में भ्रमण करनेवाला कश्यप ये शतपथब्राह्मण में निर्दिष्ट दो अवतार पौराणिक साहित्य में विष्णु के अवतार के नाते सुविख्यात हुए [श. ब्रा. १.८.१, ७.५१]
उपनिषदों में n.  मैत्री उपनिषद में, समस्त सृष्टि धारण करनेवाले अन्नपरब्रह्म को भगवान् विष्णु कहा गया है । कठोपनिषद् में साधक के अध्यात्मिक साधना का अंतिम ‘श्रेयस्’ विष्णु का परम पद बताया गया है । इन निर्देशों से प्रतीत होता है कि, उपनिषद् काल में, विष्णु इस सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ देवता माना जाने लगा था । डॉ. भांडारकरजी के अनुसार, उपनिषदों में वर्णित ‘परब्रह्म’ की कल्पना से काफ़ी मिलतीजुलती है । इसी कल्पनासाधर्म्य के कारण, वैदिकोत्तर काल में विष्णु तत्त्वज्ञों के द्वारा पूजित एक सर्वसामान्य देवता बन गया।
गृह्यसूत्रों में n.  आगे चल कर, विष्णु भारतीयों के नित्यपूजन का देवता बन गया। आपस्तंब, हिरण्यकेशिन्, पारस्कर आदि आचार्यों के द्वारा प्रणीत विवाहविधि में, सप्तपदी-समारोह के समय निम्नलिखित मंत्र वैदिक मंत्रों के साथ अत्यंत श्रद्धाभाव से पठन किया जाता हैः-- विष्णुस्त्वां आनयतु। [पा. गृ. १.७.१] । (इस जीवन में विष्णु सदैव तुम्हारा मार्गदर्शन करता रहे) ।
महाभारत में n.  इस प्रकार विष्णु देवता का माहात्म्य बढते बढते, महाभारतकाल में यह समस्त सृष्टि का नियन्ता एवं शास्ता देवता माना जाने लगा। महाभारत में प्राप्त ब्रह्मदेव-परमेश्र्वर संवाद में, ब्रह्मा के द्वारा ‘परमेश्र्वर’ को नारायण, विष्णु एवं वासुदेव आदि नामों से संबोधित किया गया है । इससे प्रतीत होता है कि, महाभारतकाल में ये तीनों देवता एकरूप हो कर, सभ्मिलित स्वरूप में इन तीनों की उपासना प्रारंभ हुई थी [म. भी.६१.६२] । महाभारत में प्राप्त ‘अनुगीता’ में वासुदेव कृष्ण एवं श्रीविष्णु का साधर्म्य स्पष्टरूप से प्रतीत होता है । भगवद्गीता तक के समस्त वैष्णव साहित्य में एक ही एक ‘वासुदेव कृष्ण’ की उपासना की गयी है, एवं वहाँ कहीं भी विष्णु का निर्देश प्राप्त नहीं है, जो सर्वप्रथम ही अनुगीता में पाया जाता है । भारतीय युद्ध के पश्र्चात्, द्वारका आते हुए भगवान् श्रीकृष्ण की भेंट भृगुवंशीय उत्तंक ऋषि से हुई। भारतीय युद्ध के संहारसत्र की वार्ता कर उत्तंक ऋषि अत्यंत क्रुद्ध हुआ, एवं श्रीकृष्ण को शाप देने के लिए प्रवृत्त हुआ। इस समय कृष्ण ने उसे ‘अनुगीता’ के रूप में अध्यात्मतत्त्वज्ञान कथन किया, एवं उत्तंक को अपना वहीं विराट स्वरूप दिखाया, जो भगवद्गीता कथन के समय उसने अर्जुन को दिखाया था । किन्तु उस विराट स्वरूप को अनुगीता में ‘विष्णु का सही स्वरूप’ (वैष्णव रूप) कहा गया है, जिसे भगवद्गीता में ‘वासुदेव का सही स्वरूप’ कहा गया था [म. आश्र्व. ५३-५५] । महाभारत में अन्यत्र युधिष्ठिर के द्वारा किये गये कृष्णस्तवन में कृष्ण को विष्णु का अवतार कहा गया है [म.शां. ४३] । महाभारत में बहुधा सर्वत्र विष्णु को ‘परमात्मा’ माना गया है, फिर भी विष्णुस्वरूपों में से नारायण एवं वासुदेव-कृष्ण के निर्देश वहाँ अधिकरूप में पाये जाते है ।
विष्णु-उपासना के तीन स्तोत्र n.  जैसे पहले ही कहा गया है, महाभारत में एवं उस ग्रंथ के उत्तरकाल में प्रचलित विष्णु-उपासना में, वैदिक विष्णु में वासुदेव कृष्ण एवं नारायण ये दों देवता सम्मीलित किये गये है । विष्णु-उपासना में प्राप्त, वैदिक विष्णु के अतिरिक्त अन्य दो स्त्रोंतों की संक्षिप्त जानकारी निम्न दी गयी हैः-- (१) वासुदेव-कृष्ण-उपासना---वासुदेव उपासना का सर्वाधिक प्राचीन निर्देश पतंजलि के व्याकरणमहाभाष्य में प्राप्त है, जहाँ वासुदेव को एक उपासनीय देवता कहा गया है [महा. ४.३.९८] । इससे प्रतीत होता है की, पाणिनि के काल में वासुदेव की उपासना की जाती थी । राजपुताना में स्थित घोसुंडि ग्राम में प्राप्त २०० ई. पू. के शिलालेख में वासुदेव एवं संकर्षण की उपासना का निर्देश प्राप्त है । वेसनगर ग्राम में प्राप्त हेलिओदोरस के २०० ई.पू. के शिलालेख में भी वासुदेव की उपासना प्रीत्यर्थ एक गरुडध्वज की स्थापना करने का निर्देश प्राप्त है, जहॉं उसने स्वयं को भागवत कहा है । इससे प्रतीत होता है कि, पूर्व मालव देश में २०० ई. पू. में वासुदेव की देवता मान कर पूजा की जाती थी, एवं उसके उपासकों को भागवत कहा जाता था । हेलिओदोरस स्वयं तक्षशिला का युनानी राजदूत था, जिससे प्रतीत होता है कि, भागवतधर्म का प्रचार उत्तरी-पश्र्चिम प्रदेश में रहनेवाले युनानी लोगों में भी प्रचलित था । इसी प्रकार नानाघाट में प्राप्त ई. स. १ ली शताब्दी के शिलालेख में भी वासुदेव एवं संकर्षण देवताओं का निर्देश प्राप्त है । पतंजलि के महाभाष्य में वासुदेव-देवता का स्पष्टीकरण देते समय, यह वृष्णि-वंश उत्पन्न क्षत्रिय राजा न हो कर, एक स्वतंत्र दैवी देवता है, ऐसा स्पष्टीकरण प्राप्त है । किन्तु फिर भी भागवत-सांप्रदाय में सर्वत्र वासुदेव-कृष्ण को वृष्णि राजकुमार ही माना जाता है, जिस परंपरा का निर्देश पतंजलि के उपर्युक्त स्पष्टीकरण में प्राप्त है । डॉ. भांडारकरजी के अनुसार, वासुदेव, संकर्षण एवं अनिरुद्ध ये तीनों वृष्णि अथवा सात्वत राजकुमार थे, जिनमें से वासुदेव की पूजा एक परमात्मन् के नाते पतंजलि-काल से सात्वत लोगों में की जाती थी । वासुदेव-कृष्ण की इसी पूजा का निर्देश मेगॅस्थिनीस के प्रवासवर्णनों में प्राप्त है, जहाँ यमुना नदी के तट पर स्थित शूरसेन देश में इस देवता की उपासना प्रचलित होने का उल्लेख है । किन्तु इस प्राचीनकाल में केवल वासुदेव की ही पूजा की जाती थी । (२) नारायण उपासना---महाभारत के शांतिपर्व में ‘नारायणीय’ नामक उपाख्यान में नारायण की उपासना की सविस्तार जानकारी प्राप्त है । इस जानकारी के अनुसार इस सृष्टि का परमात्मन् नारायण है, जिसने अपने एकांतिक धर्म का कथन सर्वप्रथम नारद को किया था, जो आगे चल कर उसने ‘हरिगीता’ के द्वारा जनमेजय को कथन किया था । यही उपदेश कृष्णरूपधारी नारायण ने भारतीय युद्ध के प्रारंभ में अर्जुन को किया था । इस सात्वत धर्म का कथन स्वयं नारायण हर एक मन्वन्तर के प्रारंभ में करते है, एवं मन्वन्तर के अन्त में वह नष्ट हो जाता है । इस मन्वन्तर के प्रारंभ में भी नारायण ने अपने इस धर्म का निवेदन दक्ष, विवस्वत्, मनु एवं इक्ष्वाकु राजाओं को किया था । इस धर्म में, यज्ञ में की जानेवाली पशुहिंसा एवं ऋषियों के द्वारा अरण्य में की जानेवाली तपस्या त्याज्य मानी गयी है, एवं इन दोनों उपासनाओं के बदले में नारायण की निष्ठापूर्वक भक्ति प्रतिपादन की गयी है । इसी संदर्भ में बृहस्पति के द्वारा की गयी यज्ञसाधना, एवं एकत, द्वित, एवं त्रित आदि के द्वारा हज़ारों वर्षों तक की गयी तपःसाधना निष्फल बतायी गयी है, एवं इन दोनों उपासनापद्धति को त्याग कर हरि की भक्ति करनेवाला उपरिचर वसु राजा श्रेष्ठ बताया गया है । इससे प्रतीत होता है कि, यज्ञमार्ग एवं तपस्यामार्ग छोड़ कर आरण्यकों में निर्दिष्ट मार्गों से निर्लेप भक्ति सिखाने वाला ‘नारायण सांप्रदाय’ एक श्रेष्ठ श्रेणि का भक्तिसांप्रदाय है । बौद्ध एवं जैन धर्मों को प्रतिक्रिया स्वरूप में इस सांप्रदाय का प्रथम जन्म हुआ, एवं इसीसे आगे चल कर वैष्णव सांप्रदाय का विकास हुआ। इस सांप्रदाय में कंसवध के लिए मथुरा में उत्पन्न हुए कृष्ण को ‘नारायण’ अथवा ‘वासुदेव’ का अवतार कहा गया है । नारायण के इसी अवतार के द्वारा प्रणयन किये गये ‘भगवद्गीता’ के द्वारा वैष्णवधर्म का पुररुस्थान हुआ, एवं एक देशव्यापी धार्मिक आंदोलन के रूप में यह सांप्रदाय पुनराविष्कृत हुआ।
विष्णु देवता की उत्क्रान्ति n.  वैदिक साहित्य में एक सौर देवता के नाते वर्णन किया गया विष्णु, ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञदेवता बन गया। आगे चल कर यज्ञयागादि कर्मकाण्डों की लोकप्रियता जब कम होने लगी, तब इन कर्मकाण्डों से प्राप्त होनेवाला पुण्य केवल विष्णु की उपासना से ही प्राप्त होता है, ऐसी धारणा समाज में दृढमूल हुई [मै. उ. ६.१६] । इसही काल में ब्रह्मा, विष्णु वं महेश इस त्रिमूर्ति की कल्पना प्रचलित हुई, एवं इन तीन देवता क्रमशः सृष्टि के उत्पत्ति, स्थिति एवं लय की अधिष्ठात्री देवता बन गये [मै. उ. ४.५];[ शिखा.२] । इसी समय, विष्णु को ॐ कार में से ‘उ’ कार के साथ श्रीविष्णु को समीकृत किया जाने लगा [नृसिंहोत्तर तापिनी.३] । उपनिषदों में अन्यत्र विष्णु के नाम से एक गायत्रीमंत्र दिया गया है, एवं गोपीचंदन को ‘विष्णुचंदन’ कहा गया है [वासु. उ. २.१]
पौराणिक साहित्य में n.  इस साहित्य में इसे सत्त्वगुण प्रधान देवता माना गया है, एवं जगत्संचालन एवं पालन का कार्य इसीके ही अधीन माना गया है । इसी कारण विभिन्न युगों में, यह नानाविध अवतार धारण कर पृथ्वी पर अवतीर्ण होता है, तथा दृष्टों के संहार का एवं पृथ्वी के पालन का कार्य निभाता है ।
स्वरूपवर्णन n.  विष्णु का विस्तृत स्वरूपवर्णन पुराणों में प्राप्त है, जहॉं चतुर्हस्त, एवं शंख, चक्र पद्म, गदाधारी बताया गया है । इसके आयुधों में शार्ङ्ग धनुष एवं नंदन खड्ग प्रमुख थे । इसके आभूषणों में पितांबर, वनमाला, किरीटकुंडल एवं श्रीवत्स प्रमुख थे । इसकी पत्नी का नाम लक्ष्मी है, जिसके साथ यह वैकुंठलोक में निवास करता है । कभी कभी यह क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन करता है । विष्णु के इन्हीं गुणवैशिष्ट्यों को अंतर्भूत कर इसके सहस्त्र नाम बताये गये है, जो ‘विष्णुसहस्त्रनाम’ में उपलब्ध है । विष्णु देवता निम्नलिखित वर्णन भागवत में प्राप्त हैः--श्रीरोदं में प्रिय धाम, श्र्वेतद्वीपं च भास्वरम्॥ श्रीवत्सं कौस्तुभं मालां, गदां कौमोदकीं मम। सुदर्शनं पाञचजन्यं सुपर्णं पतगेश्र्चरम्॥ शेषं मत्कलां सूक्ष्मां श्रियं देवीं मदाश्रयाम्। [भा. ८.४.१८-२०]
विष्णु की उपासना n.  स्कंद में विष्णु की उपासना सविस्तृत रूप में बतायी गयी है, जहॉं हर एक माह में उपासनायोग्य विष्णु के नाम, एवं उसके प्रिय फूल, एवं फल बताये गये हैः---

विष्णु का नाम - विष्णु
फूल - अशोक
फल - अनार

विष्णु का नाम - मधुसूदन
फूल - मोगरा
फल - नारियल

विष्णु का नाम - त्रिविक्रम
फूल - पाटली
फल - आम

विष्णु का नाम - श्रीधर
फूल - कलंब
फल - कटहल

विष्णु का नाम - ह्रषीकेश
फूल - करवीर
फल - खजूर

विष्णु का नाम - पद्मनाभ
फूल - जाई
फल - ताडफल

विष्णु का नाम - दामोदर
फूल - मालती
फल - रायआंवला

विष्णु का नाम - केशव
फूल - सूर्यकमल
फल - वेलफल

विष्णु का नाम - नारायण
फूल - चंद्रविकासी कमल
फल - नारंगी
१०
विष्णु का नाम - माधव
फूल - जुही
फल - पुगीफल
११
विष्णु का नाम - गोविंद
फूल - उंडली
फल - करौंद्रा
१२
विष्णु का नाम - ?
फूल - ?
फल - जायफल
विष्णु के अवतार n.  वैदिक साहित्य में केवल प्रजापति के ही अवतार दिये गये है । किन्तु पुराणों में विष्णु, रुद्र, गणपति, आदि सारे देवताओं के अवतार दिये गये है । पुराणों में निर्दिष्ट इन अवतारों के अतिरिक्त, द्वादश देवासुर संग्रामों में विष्णु एवं रुद्र ने स्वतंत्र अवतार लिये थे (देव देखिये) । महाभारत में प्राप्त नारायणीय में विष्णु के अवतारों की जानकारी दी गयी है, जहाँ विष्णु के द्वारा दुष्टों के संहारथि, एवं सज्जनों के रक्षणार्थ लिये गये ‘पार्थिव’ रूपों को ही केवल अवतार कहा गया है । वहाँ विष्णु के निम्नलिखित दस अवतार बताये गये हैः-- वागह, नारसिंह, वामन, परशुराम, राम, दशरथि, वासुदेव कृष्ण (सात्वत), हंस, कूर्म, मत्स्य, एवं कल्कि [म. शां. ३२६.८३५] । वायु में विष्णु के अवतार दस बताये गये है, किन्तु वहाँ हंस, कूर्म एवं मत्स्य के स्थान पर दत्तात्रेय, वेदव्यास एवं एक अनामिक अवतार बताया गया है [वायु. ९८.२११];[ वराह. ११३] । उसी पुराण में अन्यत्र इन अवतारों की संख्या ७७ बतायी गयी है [वायु. ९७.६४] । भागवत में विष्णु के बाईस अवतार बताये गये है, जहॉं कपिल, दत्तात्रेय, ऋषभ, एवं धन्वंतरि को विष्णु के अवतार कहा गया है । इनमें से ऋषभ जैनों का प्रथम तीर्थकर माना जाता है । मत्स्य में प्राप्त दशावतारों में नारायण, मानुष-सप्त, वेदव्यास एवं गौतम बुद्ध ये नये अवतार बताये गये है [मत्स्य. ४७.२३७-२५२] । वराह एवं नृसिंह में भी दशावतारों की जानकारी प्राप्त है | [वराह. ११३];[ नृसिंह ५४.६] । हरिवंशादि पुराणों में विष्णु के अवतारों की संख्या अनन्त बतायी गयी है --प्रादुर्भांवसहस्त्राणि अतीतानि न संशयः। भूयश्चैव भविष्यन्तीत्येवमाह प्रजापतिः॥ [ह. व. १.४१.११];[ ब्रह्म. २१३.१७] ।(विष्णु के अनन्त अवतार पूर्वकाल में हुए हैं, एवं उतने ही अवतार भविष्यकाल में होनेवाले है) । नामावलि---महाभारत एवं विभिन्न पुराणों में प्राप्त विष्णु के अवतारों की नामावलि निम्नप्रकार हैं --
(१) अजित (विभु)---चाक्षुष एवं स्वारोचिप मन्वंतरों में तुषित के पुत्र के रूप में उत्पन्न [भा. ८.५. ९]
(२) अनिरुद्ध---(चतुर्व्युह देखिये) ।
(३) अपान्तरतम सारस्वत व्यास---कृष्ण द्वैपायन व्यास का पूर्वजन्म [म. शां. ३३७.३८-४०]
(४) इंद्र---इसने अंधक, प्रह्लाद, विरोचन, वृत्र आदि असुरों का पराजय किया [पद्म. सृ. १३]
(५) उरुक्रम---यह नाभि एवं मेरुदेवी का पुत्र था [भा. १.३.१३]
(६) ऋषभ---दक्षसावर्णि मन्वंतर में उत्पन्न एक अवतार, जो नाभि एवं सुदेवी का पुत्र था [भा. २.७.९, ५.३];[ स्कंद. वैष्णव. १८]
(७) कव---बृहस्पतिपुत्र [ह. वं. २.२२.३९]
(८) कपिल---सांख्यशास्त्रप्रवर्तक एक आचार्य, जो स्वायंभुव मन्वतर में उत्पन्न हुआ था । इसके शिष्य का नाम आसुरि था [भा. १.३.१०, २.७.३. ३.२४, ८.१.६];[ म. शां. ३२६.६४];[ स्कंद. वैष्णव. १८]
(९) कल्कि विष्णुयशस्---यह अवतार गंगा-यमुना नदियों के बीच में स्थित संभलग्राम में संपन्न होगा [म. शां. ३२६.७२];[ अग्नि. १६.८-१०];[ ब्रह्म. २१३.१६४];[ ब्रह्मवै. प्रकृति. ७.५८];[ पद्म उ. २५२];[ भा. १.३.२५, २.७.३८, ११. ४.२२];[ मत्स्य. ४७];[ वायु. ९८.१०४-११५];[ ह. वं. १.४१.१६२-१६६];[ ब्रह्मांड. ३. ७३.१०४]
(१०) कूर्म---म. शां. ३२६.७२; भा. १.३. १६, २.७.१३, ११.४.१८; ह. व. २.२२.४२; विष्णु. १.४.८; अग्नि. ३
(११) कृष्ण---[अग्नि. १२];[ पद्म. उ.२४५-२५२];[ ब्रह्म. २१३.१५९-१६२];[ भा. १.३.२८, २.७.२६-३५, १०, ११.४.२२];[ ह. वं. १.४१.१५६-१६०, २.२२.४८];[ वायु. ९८.९४-१०३];[ ब्रह्मांड. ३.७३.९३-९४] । इसका वर्ण कृत, त्रेता, द्वापर, एवं कलियुगों में क्रमशः श्र्वेत, रक्त, पीत, एवं कृष्ण रहता है [म. व. १४८.१६-३३];[ शां. ३२६.८२-९३]
(१२) चतुर्व्यूह---चार अवतरों का एक देवतासमूह, जिसमें निम्नलिखित अवतार शामिल थेः--
नाम - वासुदेव
गुणवैशिष्ट्य - ज्ञान, ऐश्वर्यादि से युक्त
कार्य - मुक्तिप्राप्ति
नाम - संकर्षण
गुणवैशिष्ट्य - ज्ञान बलयुक्त
कार्य - शास्त्रप्रवर्तन, संहार
नाम - प्रद्युम्न
गुणवैशिष्ट्य - ऐश्वर्य वीर्ययुक्त
कार्य - धर्मनयन, सृष्टि निर्माण
नाम - अनिरुद्ध
गुणवैशिष्ट्य - शक्ति तेजोयुक्त
कार्य - तत्त्वगमन एवं सृष्टिरक्षण
[म. शां. ३२६.३५-४३, ६८-६९];[ ब्रह्म. १८०];[ कूर्म. पूर्व. ५१.३७-५०];[ स्कंद. वैष्णव. वासुदेव. १८]; रामानुजदर्शन पृ. ११५ ।
इनके नाम नर, नारायण, हरि तथा कृष्ण भी प्राप्त है [म. शां. ३२१.८-१८] । 
(१३) जाभदग्न्य राम---(परशुराम देखिये) । 
(१४) दत्तात्रेय---[ब्रह्म. २१३.१०६];[ भा. १.३.११];[ मत्स्य. ४७];[ वायु. ९८.८९];[ ब्रह्मांड. ३.७३.८८];[ ह. वं. १.४१.१०४-११०, २.४८.१९-२०] । 
(१५) धन्वंतरि---[भा. १.३.१७, २.७.२१] । 
(१६) धर्मसेतु---धर्मसावर्णि मन्वंतर में उत्पन्न एक अवतार। 
(१७) नरनारायण---धर्म एवं मूर्ति के पुत्र। हरि एवं कृष्ण इन्हींकी ही मूर्तियाँ है [भा. १.३.९, २.७.६, ११.४.६-१६, म. शां. ३२६.११, ९९] । 
(१८) नरसिंह---(नृसिंह देखिये) । 
(१९) नारद---सात्वधर्मोपदेशक [भा. १.३.८, २.७.१९]
(२०) नारायण---हिरण्यकशिपु का वधकर्ता [मत्स्य. ४७];[ ह. वं. २.७१.२४];[ वायु. ९८.७१-७३];[ ब्रह्मांड. ३.७३.७२] । 
(२१) नृसिंह---[म. स. ३५. परि. १.२१.३१०];[ शां. ३२६.७३, ३३७.३६];[ अग्नि. ४.३-४];[ ब्रह्म. २१३.४३-१०४];[ विष्णु. १.२०];[ भा. १.३.१८, २.७.१४, ७.८, ११.४.१९];[ ह. वं. १.४१.३९-७९, २.२२.३७, ४८.१७, ७१.३३];[ ब्रह्मांड. ३.७२.७३, ७३.७४];[ वायु. ९८.७३];[ मत्स्य. ४७];[ पद्म. उ. २३८] । 
(२२) पद्मनाभ---[ह. वं. २.७१.२९] । 
(२३) परशुराम जामदग्न्य---[म. शां. ३२६.७७];[ अग्नि ४.१२-१९];[ पद्म. उ. २४१];[ ब्रह्म. २१३.११३-१२३];[ ह. वं. १.१४१.१११-१२१, २.८.२०];[ भा. १.३.२०, २.७.२२];[ मत्स्य. ४७];[ ब्रह्मांड. ३.७३.९०-९१];[ वायु. ९८.९१] । 
(२४) पौष्करक---[ब्रह्म. २१३.३१];[ भा. १.३.१-२];[ ह. वं. १.४१.२७];[ म. स. परि. १.२१.१४०];[ शां. ३२६.६९] । 
(२५) बलराम---[भा. १.३] । 
(२६) बालमुकुंद---[म. व. १८६.११४-१२२, १८७.१-४७] । 
(२७) बुद्ध---[म. शां. ३२६.७२];[ नृसिंह. ३६.९];[ अग्नि. १६.१-८];[ पद्म. उ. २५२];[ मत्स्य. ४७] । 
(२८) बृहद्भानु---भौत्य मन्वंतर का एक अवतार। 
(२९) मत्स्य---[म. शां. ३२६.७२];[ अग्नि. २];[ भा. १.३, २.७.१२, ११.४.१८];[ विष्णु १.४.८] । 
(३०) मांधातृ चक्रवर्तिन्---[मत्स्य. ४७.१५];[ वायु. ९८.९०];[ ब्रह्मांड. ३.७३.९०] । 
(३१) मोहिनी---[म. आ. १६.२९];[ भा. १.३.१७, ८.८];[ ह. वं. २.२२.४१];[ विष्णु. १.९.१०६-१०९] ।  (३२) यज्ञ---पद्मनाभ का नामांतर [ह. वं. २.७१.३०];[ भा. १.३.१२, ८.१.६] । 
(३३) राम दशरथि---[अग्नि. ५-११];[ वायु. ९८.९२];[ म. व. २५७-२७६];[ शां. ३२६.७८-८१];[ व. १४६.१५७];[ भा. २.७.२५, ११.४.२१];[ ह. वं. १.४१.१२१-१५५, २.२२.४४, ४८.२२, ७१.३८];[ मत्स्य. 47.२४];[ ब्रह्मांड. ३.७३.९१-९२];[ विष्णु. ४.४.४०];[ ब्रह्म. २१३.१२४-१५८];[ पद्म. उ. २४२-२४४] । 
(३४) रामकृष्ण---[भा. १.३.२३] । 
(३५) रुद्र---त्रिपुरदहन [पद्म. सृ. १९१] । 
(३६) वराह---[म. स. ३५]; परि. १.२१.१४०-१६९;[ शां. २०२.१५-२८, ३२६.७२, ३३७.३६];[ भा. १.३.७, २.७.१, ३.१३-१९, ११.७.१८];[ ह. वं. १.४०, ४१.२८.३९, २.२२.४०, ४८.१२-१३, ७१.३३];[ विष्णु. १.४.८];[ अग्नि. ४.१-२];[ ब्रह्म. २१३.३२-७३];[ ब्रह्मांड. ३.७२.७३];[ पद्म. सृ. १३.१९४]; उ. २३७ । 
(३७) वामन---[म. स. ३५]; परि. १.२१.३७०;[ शां. ३२६.७४-७५];[ ब्रह्मांड. ३.७३.७७, ३३७.३६];[ भा. १.३.१९, २.७.१७, ११.४.२०];[ ह. वं. १.४१.७९-१०६, २.२२.४३, ४८.१८, ७१.३४];[ मत्स्य. ४७];[ ब्रह्म. २१३.१०५];[ वायु. ९८.७४ - ७७. ब्रह्मांड. ३.७२.७३];[ पद्म. सृ. २३९-२४०];[ अग्नि. ४.७-११]
(३८) विष्वक्सेन---ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तर का एक अवतार । 
(३९) वैकुण्ठ---रैवत एवं चाक्षुष मन्वन्तर का एक अवतार। 
(४०) व्यास---[भा. ३.१.२१, २.७.३६];[ मत्स्य. ४७];[ ह. वं. १.४१.१६१-१६२];[ वायु. ९८.९३];[ ब्रह्मांड. ३.७३.९२-९३];[ कूर्म. पूर्व. ५१.१-११];[ म. शां. ३३४.९, ३३७.३८-४०, ५३-५७] । 
(४१) शिव---(भव) [ह. वं. २.२२.३९] । 
(42) संकर्षण---[भा. ५.२५.१] । 
(४३) सत्य (सत्यसेन)---उत्तम मन्वन्तर का एक अवतार। 
(४४) सनक; 
(४५) सनत्कुमार; 
(४६) सनंदन, 
(४७) सनातन---[भा. २.७.५, ३.१२.४, ४.८.१] । 
(४८) सार्वभौम---सावर्णि मन्वन्तर का एक अवतार।
(४९) सुयज्ञ---रुचि एवं आकृति का पुत्र [भा. २.७.२] । 
(५०) स्वधामन्---रुद्रसावर्णि मन्वन्तर का एक अवतार। 
(५१) हंस---[म. शां. ३२६.];[ भा. ११.१३] । 
(५२) हयग्रीव---[म. शां. ३२६.५६, ९४, ३३५];[ भा. .७.११, ११.४.१७] । 
(५३) हरि---१. गजेन्द्रमोक्ष [भा. ८.२-४, १०]; २. चतुर्व्यूह अवतारों में से एक [म. शां. ६२१.८-१७]; नरनारायण देखिये ।
विष्णु सांप्रदाय के ग्रंथ n.  इस सांप्रदाय के निम्नलिखित ग्रन्थ प्रमुख हैं जो, ‘पंचरत्न’ सामुहिक नाम से प्रसिद्ध है । ‘पंचरत्न’ में समाविष्ट पाँच आख्यान महाभारत एवं भागवत में समाविष्ट है, एवं विष्णु के उपासक उसका नित्य पठन करते हैः--  (१) भगवद्गीता---भगवान् कृष्ण ने यह अर्जुन को कथन की थी । यह वैष्णव सांप्रदायांतर्गत ‘एकन्तिक धर्म’ का आद्य ग्रन्थ माना जाता है ।  (२) विष्णुसहस्त्रनाम---महाभारत के अनुशासन पर्व में विष्णुसहस्त्रनाम प्राप्त है, जिसमें १०७ श्र्लोकों में विष्णु के सहस्त्रनाम दिये गये है । इस ग्रंथ पर आद्य शंकराचार्य के द्वारा लिखित भाष्य उपलब्ध है । इसके अंतर्गत विष्णु के बहुत सारे नाम वैदिक साहित्य में से (ऋ.षिभिः परिगीतानि) उद्धृत किये गये है । इन्ही नामों का कथन भीष्म के द्वारा युधिष्ठिर को एक सर्वश्रेष्ठ जपसाधन के रूप में किया गया था [म. अनु. १४९.१४-१२०] ।  (३) अनुगीता---यह कृष्ण के द्वारा उत्तंक को कथन की गयी थी [म. आश्र्व. ५३-५५] ।  (४) भीष्मस्तवराज---इसमें भीष्म के द्वारा की गयी विष्णु की स्तुति संग्रहित की गयी है ।  (५) गजेंद्रमोक्ष---यह आख्यान शुक के द्वारा परिक्षित् राजा को सुनाया गया था, जहाँ उत्तम मन्वन्तर में हुए ‘गजेंद्रमोक्ष’ की कथा सुनायी गयी है [भा. ८.२-४] उपर्युक्त आख्यानों के अतिरिक्त निम्नलिखित पुराणग्रन्थ भी विष्णु से संबंधित, अतएव ‘वैष्णव’ कहलाते है--- १. गरुडपुराण;  २. नारदपुराण;  ३. भागवतपुराण;  ४. विष्णुपुराण जिसमें विष्णुधर्मोत्तर पुराण भी समाविष्ट है [स्कंद. शिवरहस्यखंड. संभवकाण्ड. २.३४]
विष्णु के तीर्थस्थान n.  महाभारत एवं पुराणों में विष्णु के निम्नलिखित तीर्थस्थानों का निर्देश प्राप्त हैः-- (१) विष्णुपदतीर्थ---यह कुरुक्षेत्र में था । यही नाम के अन्य तीर्थ भी भारतवर्ष में अनेक थे इस तीर्थ में स्नान कर के वामन की पूजा करनेवाला मनुष्य विष्णु लोक में जाता है [म. व. ८१.८७] । -(२) विष्णुपद---गया में स्थित एक पवित्र पर्वत, जहाँ धर्मरथ ने यज्ञ किया था [मत्स्य. ४८.९३] । ब्रह्मांड में निषद पर्वतों में स्थित एक सरोवर का नाम भी ‘विष्णुपद’ दिया गया है [ब्रह्मांड. २.१८.६७] । इसी ग्रंन्थ में अन्यत्र गंगानदी के उगमस्थान को ‘विष्णुपद’ कहा गया है, एवं ध्रुव का तपस्यास्थान भी वही बताया गया है [ब्रह्मांड. २.२१.१७६]
कई प्रमुख वैष्णव सांप्रदाय n.  श्रीविष्णु एवं वासुदेवकृष्ण की उपासना के अनेकानेक सांप्रदाय ऐतिहासिक काल में उत्पन्न हुए थे, जिन्होंने विष्णु-उपासना का स्त्रोत सदियों तक जागृत रखने का महनीय कार्य किया। विष्णु उपासना के निम्नलिखित सांप्रदाय प्रमुख माने जाते हैः-- १. रामानुज-सांप्रदाय (११ वीं शताब्दी); २. माध्व अथवा आनंदतीर्थ सांप्रदाय (११ वीं शताब्दी); ३. निंबार्क-सांप्रदाय (१२ वीं शताब्दी); ४. नामदेव एवं तुकाराम-सांप्रदाय (१३ वीं शताब्दी); ५. कबीर-सांप्रदाय (१५ वी शताब्दी); ६. वल्लभ-सांप्रदाय (१५ वी शताब्दी); ७. चैतन्य-सांप्रदाय (१५ वी शताब्दी); ८. तुलसीदास-सांप्रदाय (१६ वीं शताब्दी)
 m  One of the Hindu triad.
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